Activity No. 20

इस एक्टिविटी का नाम है – जपो नाम अरहंत का
आज की एक्टिविटी में आपको सभी प्रश्नों के उत्तर अ अक्षर से ही देना है ।
1. नंदीश्वर द्वीप म पाया जाना वाला एक पर्वत ।
2. साधन से होने वाला साध्य का ज्ञान – ऐसे परोक्ष प्रमाण का एक भेद ।
3. सात सौ मुनिराजों के संघ के नायक एक आचार्य ।
4. जिस ज्योतिषि देव ने देशभूषण एवं कुलभूषण मुनिराज पर उपसर्ग किया तथा जो वनवासी राम और लक्ष्मण के निमित्त से दूर हुआ ।
5. जिनके आने की कोई तिथि नहीं होती ऐसे मुनि आर्यिका आदि कहलाते हैं ।
6. मुनिराजों को कहते हैं ।
7. कृष्ण का पोता और प्रद्युम्न का पुत्र ।
8. पं. दीपचंद जी शाह द्वारा रचित एक आध्यात्मिक ग्रंथ ।
9. राजा श्रेणिक का पुत्र ।
10. शक्ति का छोटे से चोट अंश कहलाता है ।
11. गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र ।
12. उस विशालकाय जानवर का नाम जिसकी पीठ पर भी चार पैर होते हैं ।
13. अरहंत परमात्मा जिन अठारह दोषों से रहित होते हैं , उनमे से एक ।
14. दूसरे नं के रुद्र जितशत्रु किस तीर्थंकर के काल में हुए ।
15. बहुप्रदेशी द्रव्य को कहते हैं ।
16. आयु कर्म के अभाव में प्रगट होने वलवात्मा का गुण ।
17. लक्षण का लक्ष्य और अलक्षय दोनो में पाया जाना कहलाता है ।
18 . अर्थदण्ड का एक भेद ।
19. औदायिक भाव का वह भेद जिसके उदय में जीव सिद्धत्व को प्राप्त ना कर सके ।
20. कविवर पं. श्री दौलतराम जी ने छःढाला ग्रंथ की दूसरी ढाल के दूसरे छंद की प्रथम पंक्ति में जिसका स्वरूप बताया है ।

Activity 20
जपो नाम अरहंत का
उत्तर
1. नंदीश्वर द्वीप में पाया जाना वाला एक पर्वत ।
अंजनगिरी
2. साधन से होने वाला साध्य का ज्ञान – ऐसे परोक्ष प्रमाण का एक भेद ।
अनुमान/अभिनिबोध
3. सात सौ मुनिराजों के संघ के नायक एक आचार्य ।
अकंपनाचार्य
4. जिस ज्योतिषि देव ने देशभूषण एवं कुलभूषण मुनिराज पर उपसर्ग किया तथा जो वनवासी राम और लक्ष्मण के निमित्त से दूर हुआ ।
अग्निप्रभ देव
5. जिनके आने की कोई तिथि नहीं होती ऐसे मुनि आर्यिका आदि कहलाते हैं ।
अतिथि
6. मुनिराजों को कहते हैं ।
अनगार
7. कृष्ण का पोता और प्रद्युम्न का पुत्र ।
अनिरुद्ध
8. पं. दीपचंद जी शाह द्वारा रचित एक आध्यात्मिक ग्रंथ ।
अनुभव प्रकाश/अध्यात्म पांच संग्रह
9. राजा श्रेणिक का पुत्र ।
अभयकुमार
10. शक्ति का छोटे से चोट अंश कहलाता है ।
अविभाग प्रतिच्छेद
11. गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र ।
अश्वत्थामा
12. उस विशालकाय जानवर का नाम जिसकी पीठ पर भी चार पैर होते हैं ।
अष्टापद
13. अरहंत परमात्मा जिन अठारह दोषों से रहित होते हैं , उनमे से एक ।
अरति
14. दूसरे नं के रुद्र जितशत्रु किस तीर्थंकर के काल में हुए ।
अजितनाथ
15. बहुप्रदेशी द्रव्य को कहते हैं ।
अस्तिकाय
16. आयु कर्म के अभाव में प्रगट होने वाला आत्मा का गुण ।
अवगाहनत्व
17. लक्षण का लक्ष्य और अलक्षय दोनो में पाया जाना कहलाता है ।
अतिव्याप्ति
18 . अनर्थदण्ड का एक भेद ।
अपध्यान
19. औदायिक भाव का वह भेद जिसके उदय में जीव सिद्धत्व को प्राप्त ना कर सके ।
असिद्धत्व
20. कविवर पं. श्री दौलतराम जी ने छःढाला ग्रंथ की दूसरी ढाल के दूसरे छंद की प्रथम पंक्ति में जिसका स्वरूप बताया है ।
अग्रहीत मिथ्यादर्शन

Activity No. 19

आज की एक्टिविटी का नाम है , मोबाइल नंबर
इस एक्टिविटी में मैं यहां कुछ अंक लिखूंगी वो किसी के भेद प्रभेद होंगे आपको बताना है किसके हैं और कैसे ।
जैसे – मैनें लिखा 55567 तो इनका कुल योग हुआ 28 तो आपको बताना है कि ये मुनिराज के 28 मूलगुण हैं ,
5 महाव्रत , 5 समिति , 5 इंद्रियविजय , षट आवश्यक , शेष 7 गुण । इसप्रकार ये 28 मूलगुण हुए।
आपके लिए प्रश्न है —
1. 55567
2. 2412999
3. 5928524932
4. 2420170
5. 8525
6. 8863
7. 403224211
8. 2918213
9. 5151225
10. 53558
11. 44449
12. 1219222324
13. 55160
Activity 19 के उत्तर

1. 28 मूलगुण
मुनिराज के 28 मूलगुण हैं ,
5 महाव्रत , 5 समिति , 5 इंद्रियविजय , षट आवश्यक , शेष 7 गुण । इसप्रकार ये 28 मूलगुण हुए।

2. 63 शलाका पुरुष
24 तीर्थंकर , 12 चक्रवर्ती , 9 बलभद्र , 9 नारायण , प्रतिनारायण

3.148 कर्म प्रकृतियाँ
5 ज्ञानावरण , 9 दर्शनावरण , 28 मोहनीय , 5 अंतराय , 2 वेदनीय , 4 आयु , 93 नाम , 2 गोत्र

4. तीर्थंकर
24 वर्तमान चौबीसी , 20 विदेह क्षेत्र के , 170 कर्मभूमि के

5. पुद्गल की पर्याय
8 स्पर्श की , 5 रस की , 2 गंध की , 5 वर्ण की

6. 25 दोष
8 शंकादि दोष , 8 मद , 6 अनायतन , 3 मूढ़ता

7. 100 इंद्र
40 भवनवासी , 32 व्यंतर , 24 कल्पवासी , 2 ज्योतिष , 1 मनुष्य , 1 तिर्यंच

8. भावों के 53 भेद
2 औपशमीक , 9 क्षायिक , 18 क्षयोपशमिक , 21 औदायिक , 3 पारिणामिक

9. आश्रव के भेद
5 मिथ्यात्व , 15 प्रमाद , 12 अविरति , 25 कषाय

10. णमोकार मंत्र
5 पद , 35 अक्षर , 58 मात्राएँ

11. 25 कषाय
4 अनंतानुबंधी , 4 अप्रत्याख्यानवारण , 4 प्रत्याख्यानवारण , 4 संज्वलन , 9 नोकषाय

12. 5 बालयति
12 वे वासुपूज्य स्वामी , 19 वे मुनिसुव्रतनाथ स्वामी, 22 वे नेमिनाथ स्वामी , 23 वे पार्श्वनाथ स्वामी , 24 वे महावीर स्वामी

13. कर्मभूमि के तीर्थंकर
5 पांच भरत क्षेत्र के , 5 पांच ऐरावत क्षेत्र , 160 पांच विदेह क्षेत्र के

Activity No. 18

Activity No. 18
आज की एक्टिविटी का नाम है – वैराग्य का कारण जातिस्मरण
आज की एक्टिविटी में आपको उन तीर्थंकरों के नाम बताने हैं जिनके वैराग्य का कारण जातिस्मरण ज्ञान बना …..पर पर ध्यान रहे कि आपको यह भी बताना है कि वे कौनसे नंबर के तीर्थंकर हैं और उनका चिन्ह कौनसा है ।
उदाहरण
पांचवे सुमतिनाथ जी चकवा का चिन्ह
उत्तर
5वे सुमतिनाथ चकवा का चिन्ह
6वे पद्मप्रभ नीलकमल का चिन्ह
12वे वासुपूज्य भैंसा का चिन्ह
16वे शांतिनाथ हिरण का चिन्ह
17वे कुंथुनाथ बकरा का चिन्ह
20वे मुनिसुव्रतनाथ कछुआ का चिन्ह
21वे नमिनाथ कमल का चिन्ह
23वे पार्श्वनाथ सर्प का चिन्ह
24वे महावीर स्वामी सिंह का चिन्ह

Activity No. 17

Activity No. 17
प्रथमानुयोग
करणानुयोग
चरणानुयोग
द्रव्यानुयोग
प्रत्येक अनुयोग के शास्त्रों के नाम उनके रचयिता के नाम के साथ बताना है ।
जीतेगा वही जो सबसे ज्यादा बताएगा ।
इस एक्टिविटी में एक ट्विस्ट है , अगर 1 अनुयोग का 1 ग्रंथ बताया और दूसरे अनुयोग के 4 तो गिना केवल एक ही जायेगा ।सभी के 2222 या 4444 ऐसे ही होना चाहिए ।
उत्तर
द्रव्यानुयोग

समयसार जी
प्रवचनसार जी
नियमसार जी
पंचास्तिकाय जी
👆
इन पांचों ग्रंथों के रचयिता कुंद कुंद आचार्य हैं
मोक्षमार्ग प्रकाशक जी – पं. टोडरमल जी
प्रथमानुयोग

हरिवंश पुराण – जिनसेनाचार्य
पद्म पुराण – रविषेण आचार्य
आदिपुराण – जिनसेनाचार्य
उत्तरपुराण – गुणभद्राचार्य
श्रीपाल चरित्र

करणानुयोग

त्रिलोकसार – आचार्य नेमीचंद
गोमटसार – आचार्य नेमीचंद
लब्धिसार – आचार्य नेमीचंद
षट्खंडागम – आचार्य भूतबलि और आचार्य पुष्पदंत
तिलोयपन्नत्ति – वृषभाचार्य यति

चरणानुयोग

भगवती आराधना – शिवकोटी मुनिराज
रत्नकरंड श्रावकाचार – समंतभद्राचार्य
मूलाचार – आचार्य वट्टकेश्वर
अष्टपाहुड – कुन्दकुन्द आचार्य
पुरुषार्थसिद्धि उपाय
श्रावक धर्म प्रकाश
आत्मानुशासन

Activity No. 16

Activity No. 16

Aaj aapko sbhi answer k word se hi dena he
Jese.. kunthunath .karm
प्रश्न :

Activity 16
उत्तर
1 कैलाश पर्वत
2 कुशील
3 केवलज्ञान
4 केशलोंच
5 कषाय
6 कुंथुनाथ
7 कुबेर
8 कल्याणक
9 काय
10 कुष्ट रोग
11 कुदेव
12 करणानुयोग
13 कल्पद्रुम
14 कैकई
15 कुम्भकरण
16 कालपरावर्तन
17 कल्पवृक्ष
18 कायोत्सर्ग

Activity No. 15

Activity No. 15

आज की एक्टिविटी में आपको देव स्तुतियाँ लिखनी हैं , उनके रचियता के नाम के साथ । आपको कम से कम दो लाइन्स तो लिखनी है । जो सबसे ज्यादा स्तुति लिखेगा वही विजेता होगा।
उत्तर
Prabhu hm sb ka ek tu hi h taran hara re
Tum ko bhula phira whi nr mara mara re
Writer pankj ji
Veera prbhu ke ye bol tera prabhu tujh hi me dole
Mn ki tu ghundi ko khol tera prabhu tujh hi me dole
_ sobhagyemal ji
Aaj hm jinraj tumhare dware aaye
Ha ji ha hm aaya aaye
Pankj ji
Dhanye dhnye aaj ghadi kaisi sukhkar h
Sidho ka darbar h ye sidho ka darbaar h
Sobhagyeml ji
Nirkhat jin chandra vadan swapd suruchi aayi
Dolatraam ji
Ab prabhu charan chhod kit jau
Aisi nirml budhi prabhu do shudhatm ko dhyau
Bhagchand ji
Prabhu pe yeh vardaan supau fir jg keech beech nhi aau
Bhagchand ji
Ashariri sidh bhagvaan aadarsh tumhi mere
Avirudh shudh chidghan utkarsh tumhi mere
Bhagchand ji
: Karlo jinwar ki pujan aai pawan ghadi
Aai pawan ghadi manbhawan ghadi
Rachiyata-rajmal pawaiya ji
Dekho ji aadishver swami kaisa dhyan lagaya h
Kr uper kr subhag viraje aasan thir thehraya h
Dolatraamji
: Shri arihant chavi lakhi hirde aanand anupm chaya h
Jineshvrdaas ji
Humko bhi bulwa lo swami siddhon ke darbar me
Jeevadik saton tatwon ki sacchi shradha ho jaye
Rajmal pawaiya ji
Thanki uttam kshma pe ji achambho mhane aawe
Kis vidhi kine karam chakchur
Jineshwrdaas ji
Mera aaj talak prabhu karunapati thare charno me jiyara gaya hi nahi
Chamanji
Rom rom pulkit ho jae jb jinver ke darshan paye d
Gyananand kaliya khil jae jb jinvr ke darshan paye
Jineshvr daas ji
Chah mujhe h darshan ki prabhu ke charan sparshan ki
Jinenshvrdaas ji
Jin pratima jinvr si kahiye
Bhavik tum vandahu mndhar bhav jin pratima jinvr si kahiye
Bhaiya bhagvatidaas ji
Shri jinver pd dhyave je nr shri jinver pd dhyave h
Bhagchand ji
Panch param prmeshti dekhe hridy harshit hota h aanand ulsit hota h samyakdarshan hota h
Bhagchand ji
Vando adbhut chandravir jin bhavi chakor chit haari
Chidanand ambudhi ab ucharyo bhav tp nashan haari
Dolatraam ji
He jin tero sujag ujager gaavat h munijn gyani
Dolatram ji
Darbaar humhara mnhr h prabhu darshan kr harshaye h
Darbar tumhare aye h
Vradhichand ji
Pratham jin dhurandharam arihant dev manglam
Nabhiraj nandnm nmami aadi jinvaram
Akhil bansal ji
Naath tumhari puja me sb swaha krne aaya
Tum jaisa banne ke karan sharan tumhari aaya
Akhil bansal ji
Shri sidhchakra gungan kro mn aan bhav se prani
Kr sidho ki agvaani
Ratanchand ji
Humko bhi bulvalo swami sidho ke darbaar me
Ratanchand ji
Shri chandra jinvr chandra ankit
Chandra varn sudha nidham
Nr indra chandra munindra vandi
Chandranath jineshvaram
Bhaiya bhagvat daas ji
He veetragi veer prabhu samyaktva nidhi se pur ho
Ho karm dl ke salankarta
Sidhpur ke shur ho
Gyanchand ji
Tumse lagi h lagan lelo apni sharan
Prabhu dwar tumhare aaya tere krke darash hrshaya
Ratanchand ji
Tum ho trishla kuwar janme kundal nagar veer pyare
Meto meto ji sankt humare
Ratanchand ji
Trishla ji ke nanda majhdhar pade hum pathiko ka
Bhv se beda paar bhagvn hoga ki nhi
Ratanchand ji
Gun gao sda us nandn ke trishla jiski mehtari h
Weh bhumi mha pavan h jahan pragte dukh sankat hari h
Ratanchand ji
Veer ki jyoti jgate chalo
Jai veer jai veer gate chalo
Jeev jagat ke ho sare sukhi bhavna mn m ye bhate chalo
Ratanchand ji

Activity No. 14

Activity No. 14

आज की एक्टिविटी थोड़ी सरल ही है । जिसका नाम है अंताक्षरी राउंड 2 , एक राउंड पहले हो चुका है । आज के राउंड में मैं कुछ शब्द लिखूंगी और आपको भजन जी वो पंक्तियाँ लिखनी है जिनमें वो शब्द आए । बहुत सरल है उदाहरण की आवश्यकता नही है ।
आपके लिए प्रश्न हैं ।
1. वीतराग
2. देव
3. मुनिराज
4. शिखर
5. जैनधर्म / जिनधर्म
6. झंडा
7. अंतर्मुख
8. जिनवाणी
9. द्रव्य
10. भावना

उत्तर
1. तीन भुवन में सार वीतराग विज्ञानता , शिव स्वरूप शिवकार नमहुँ त्रियोग सम्हारिके ।
2. वीतरागी देव तुम्हारे जैसा जग में देव कहाँ , मार्ग बताया है जो जग को कह न सके कोई और यहां ।
3. होली खेले मुनिराज अकेले वन में , मधुवन में , मधुवन में आज मची रे होली मदहवन में ।
4. ऊंचे ऊंचे शिखरों वाला रे तीरथ हमारा , तीरथ हमारा हमें प्राणों से प्यारा ।
5. मैं महा पुण्य उदय से जिनधर्म पा गया , जिनधर्म पा गया जिनमंदिर आ गया ।
6. लहर लहर लहराए केशरिया झंडा जिनमत का ।
7. जिनमंदिर में आया , जिनवर दर्शन पाया , अंतर्मुख मुद्रा को देखा आतम दर्शन पाया ।
8. जिनवाणी अमृत रसाल रासिया आवो जी सुनवो ।
9.अष्ट द्रव्य का अर्घ मनोरम हर्षित होकर लाया हूँ , चिदानंद चिन्मय पद पाने जिन चरणों में आया हूँ ।
10. भावना की चुनरी ओढ़ के जिनमंदिर में आवजो रे , जिनवाणी को सूनजो रे ।

Activity No. 13

Activity No. 13
नियम
नीचे दिए गए सभी प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में ही लिखना है और सभी उत्तर के पीछे *कार* शब्द आना जरूरी है।
उदाहरण – जैन धर्म का महामंत्र – णमोकार

१) गुरुदेवश्री का हम पर है ______
२) घर आये साधर्मी का करना चाहिए _______
३) पाठशाला में मिलते है धार्मिक ______
४) प्रदेशत्व गुण के कारण सभी का होता है _________
५) भगवान की दिव्यध्वनि होती है _______
६) जिनेन्द्र भगवान को करने चाहिए _______
७)निज स्वरुप को जानने से ही मोक्ष जाना होगा _______
८)मूर्ति में भगवान की स्थापना ________
९)तुम हुए निरामया _______
१०)मोह राग-द्वेष है आत्मा के _______
११)_______ को हम नहीं करते नमस्कार। वितरागी देव शास्त्र को ही हमें करना है ______
१२)मिथ्यात्व का हमें करना है ____
१३) हमारे मुनिराज _______ का उपयोग नहीं करते।
१४)सभी जीवो पर दया करने को कहते हैं _________
१५) नेमीनाथ जी ने इस असार संसार को ______ कहा।
१६)अमृतचंद्राचार्य हे आत्मख्याति के ________

Note: दाहोद पाठशाला

१) उपकार
२) सत्कार
३) संस्कार
४) आकार
५) ओमकार
६) नमस्कार
७) साकार
८) तदाकार
९) निर्विकार
१०) विकार
११) चमत्कार, स्वीकार
१२) प्रतिकार
१३) मोटरकार
१४) परोपकार
१५) धिक्कार
१६)टिकाकार

Activity No. 12

Activity No. 12

आज की एक्टिविटी में आपको थोड़ा पुरुषार्थ करना होगा।
आज की एक्टिविटी में मैं ग्रंथ से कुछ उदाहरण लिखूंगी आपको उन्हें खोजकर उनके सिद्धांत लिखने है।
1. जैसे सूर्य का प्रकाश है सो मेघपटल से जितना व्यक्त नहीं है उतने का तो उस काल में अभाव है, तथा उस मेघपटल के मंदपने से जितना प्रकाश प्रगट है वह सूर्य के स्वभाव का अंश है , मेघपटल जनित नही है ।
2. जैसे कुत्ता हड्डी चबाता है और हड्डी की कठोरता के कारण उसके जबड़े से खून निकलता है और वह स्वयं के जबड़े से निकलते खून के स्वाद को हड्डी का स्वाद समझता है ।
3. जैसे कुत्ता बैलगाड़ी के नीचे चलता है और सोचता है कि बैलगाड़ी उसके चलने से चल रही है।
4. हस्तिविधान – जैसे कुछ अंधे व्यक्ति हाथी देखने जाते है तो हाथी के पैर को पकड़कर हाथी को खम्बे जैसा बताते है , कान पकड़कर सूपे के समान आदि।
5. जैसे एक नाव है ,उसमे छेद है , उस छेद से पानी आ रहा है ,तो नाविक ने छेद को बंद कर दिया, फिर धीरे धीरे नाव से पानी को बाहर निकाला, और नव खाली हो गयी।
6.चिंतामणि रत्न
इन उदाहरणों के सिद्धांत आपको बताने हैं ।
इन्हें लिखने में कोई भूल चूक हुई हो तो मैं उसके लिए क्षमा चाहती हूँ और निवेदन करती हूं कि बुधि जीव सुधार करें।
इनके उत्तर आप कल तक प्रेषित करें ।
उदाहरण :
6. चिंतामणि रत्न
चिंतामणि रत्न का उदाहरण छहढला में आता है कि मनुष्य भव चिंतामणि रत्न के समान अमूल्य है । जिस प्रकार चिंतामणि रत्न को कोई गवाना नही चाहता वैसे हुने अपने मनुष्य भाव को भी व्यर्थ नही करना चाहिए…
उत्तर
मोक्षसमार्ग प्रकाशक page no. 26
1- उसी प्रकार जीव का ज्ञान दर्शन वीर्य स्वभाव है वह ज्ञानावरण , दर्शनावरण , अंतराय से जितना व्यक्त नही है उतने का तो उस काल में अभाव है तथा उन कर्मों केके क्षयोपशम से जितना ज्ञान , दर्शन , वीर्य प्रगट है वह उस जीव के स्वभाव का अंश ही है कर्मजनित ओपदिक भाव नही है ।
2- उसी प्रकार जीव विषयों में प्रवर्तते है , आनंद तो उसे अपने ज्ञान आनंद गन स्व आता है पर जीव उसे विषयों का स्वाद जानता है और स्वयं की मिथ्या मान्यता से दुखी रहता है ।
मोक्षसमार्ग प्रकाशक page no. 46
3- संसार के सभी काम अपनी अपनी योग्यता से हो रहे हैं । सभी द्रव्यों का परिणमन स्वतंत्र हो रहा है , लेकिन हम मानते हैं कि घर के काम बाहर के काम सब हम कर रहे हैं । इस उदाहरण से हमारी कर्तृत्व बुद्धि पर चोट की है ।
4- इस उदाहरण से श्रुतज्ञान के अंश रूप नयों को बताया है , जिनधर्म के प्राण रूप सिद्धांत स्याद्वाद को समझाया है ।
5- ये उदाहरण सात तत्व को समझने के लिए है । इसमें नाविक जीव है , नाव अजीव है , कर्मों का आना आस्रव , कर्मों का रुक जाना बंध , कर्मों का आना रुक जाना संवर , कर्मों का एक देश ख़िरना निर्जरा , और कर्मों का पूर्ण नाश होना मोक्ष ।
छह ढाला 9th 10th छंद
Page no. 69 , 70

 

Activity No. 11

Activity No. 11

आज की एक्टिविटी में आपको अर्थ बताना है और जो भी प्रश्न हो आप पूछ सकते हैं ।…..

बंदों पांचों परम-गुरु, चौबीसों जिनराज।

करूं शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरन के काज ॥

सुनिए, जिन अरज हमारी, हम दोष किए अति भारी।

तिनकी अब निवृत्ति काज, तुम सरन लही जिनराज ॥

इक बे ते चउ इंद्री वा, मनरहित सहित जे जीवा।

तिनकी नहिं करुणा धारी, निरदई ह्वै घात विचारी ॥

समारंभ समारंभ आरंभ, मन वच तन कीने प्रारंभ।

कृत कारित मोदन करिकै, क्रोधादि चतुष्ट्य धरिकै॥

शत आठ जु इमि भेदन तै, अघ कीने परिछेदन तै।

तिनकी कहुं कोलौं कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी॥

उत्तर
दोहा : मैं अपनी पुरे दिन मे किये कार्यो की पवित्र मन से आलोचना करता हूँ | सबसे पहले मे पांच परमेष्ठियों और 24 तीर्थंकरो को नमस्कार करता हूँ | और मन वचन काय की शुद्धि करने की कोशिश करता हूँ |
पहला काव्य : हे जिनेन्द्र देव ,
अनंत काल से मेरे द्वारा कई पाप किये गए जैसे
एक ,दो, तीन,चार और पाँच इन्द्रिय मन सहित और मन रहित इन सब जीवो की मेरे द्वारा घात किया गया में अती निर्दयी होकर इन जीवो के प्रति तनिक भी करुणा अर्थात दया का भाव नहीं किया
हे प्रभु अब में आपसे इन दोषो के निवारण हेतु आपकी शरण में आता हूँ
यही विनती में आपसे क्षमा याचना सहित करता हूँ ।
दूसरा काव्य : कुल 108 तरीके से पाप करके मैने कर्मों का आस्रव किया…मैं उनको किस तरह कहूँ तुम केवलज्ञानी हो और तुम्हारे ज्ञान में सब झलकता है ।
NOTE : आज की एक्टिविटी 2 छंद तक ही करेंगे इससे आपको आईडिया लग गया होगा ऐसे आप अपनी पाठशालाओं में भी करवा सकते है ।