Activity No. 23

आज की एक्टिविटी का नाम है – करें प्रथमानुयोग की सैर
इस एक्टिविटी में आपको कुछ वाक्य दिये जायेंगे और आपको बताना है कि वह किसने किससे और कब कहा ।
तो
आपके लिए प्रश्न इसप्रकार हैं –
1. क्या इस पृथ्वी पर मेरे जैसे और भी असंख्य चक्रवर्ती राजा हो गए हैं ? इस पर्वत का खंड खंड उनकी प्रशस्तियों से भरा हुआ है । इसमें तो एक नाम लिखने की भी जगह नहीं है ।
2. भाई ! तू इस मंत्र को रात ले और जीवन में उतार ले , तेरा कल्याण हो जाएगा । मंत्र है – मा तुष मा रुष (राग मत कर द्वेष मत कर)
3. मेरे मरने के पश्चात संसार को शिक्षा देने के लिये मेरे खाली हाथ अर्थी से बाहर रखे जाएं और मेरे जनाजे के साथ अनेक देशों से लूटी हुई विशाल संपत्ति श्मशान भूमि तक ले जाई जाए , जिससे जनता यह अनुभव कर सकें कि आत्मा के साथ कोई सांसारिक पदार्थ नहीं जाता ।
4. इस समय सवाल मेरे या आपके जीवन का नहीं , अपितु जैन शासन की रक्षा का है । अब विलंब करोगे तो हम दोनों पकड़े जायेंगें , इसलिए जल्दी जाओ । जैन शासन की प्रभावना जितनी आप कर सकेंगें , उतनी मैं नहीं कर सकता , इसलिए जैन शासन की सेवा के लिये आप अपना जीवन बचाओ ।
5. मेरे पवित्र कुल को उज्ज्वल करने वाली कन्या , मैं मानता हूं कि मजाक में दिया गया व्रत भी सत्य है परंतु वह तो मात्र आठ दिनों के लिये ही था जबकि तू तो विवाह से ही इनकार कर रही हो।
6. फेरे नहीं हुए उससे क्या ? मैं उनको हृदय से वरण कर चुकी हूँ , वे ही मेरे स्वामी और जीवन साथी है मेरे हृदय में किसी और के लिये स्थान नहीं है ।अब सांसारिक भोगों के बदले मोक्ष की साधना में मैं उनकी संगिनी बनूँगी और अपने नाथ के धर्म पथ पर चल कर अपना आत्म कल्याण करूँगी ।
7. लोक निंदा के भय से आपने मुझे तो त्याग दिया परंतु लोक निंदा के भय से आप कभी जैनधर्म को मत त्यागना ।

Activity 23
करें प्रथमानुयोग की सैर
उत्तर
1. क्या इस पृथ्वी पर मेरे जैसे और भी असंख्य चक्रवर्ती राजा हो गए हैं ? इस पर्वत का खंड खंड उनकी प्रशस्तियों से भरा हुआ है । इसमें तो एक नाम लिखने की भी जगह नहीं है ।

भरत चक्रवती ने अपने सेनापति से कहा जब वे वृषभाचल पर्वत पर अपना नाम लिखने गए थे ।

2. भाई ! तू इस मंत्र को रात ले और जीवन में उतार ले , तेरा कल्याण हो जाएगा । मंत्र है – मा तुष मा रुष (राग मत कर द्वेष मत कर)

शिवभूति मुनिराज के गुरु ने शिवभूति मुनिराज से कहा जब उन्हें एक शब्द भी स्मरण नही रहता था।

3. मेरे मरने के पश्चात संसार को शिक्षा देने के लिये मेरे खाली हाथ अर्थी से बाहर रखे जाएं और मेरे जनाजे के साथ अनेक देशों से लूटी हुई विशाल संपत्ति श्मशान भूमि तक ले जाई जाए , जिससे जनता यह अनुभव कर सकें कि आत्मा के साथ कोई सांसारिक पदार्थ नहीं जाता ।

सिकन्दर ने अपने साथियों से अपनी मृत्यु से पहले अंतिम समय मे कहा ।

4. इस समय सवाल मेरे या आपके जीवन का नहीं , अपितु जैन शासन की रक्षा का है । अब विलंब करोगे तो हम दोनों पकड़े जायेंगें , इसलिए जल्दी जाओ । जैन शासन की प्रभावना जितनी आप कर सकेंगें , उतनी मैं नहीं कर सकता , इसलिए जैन शासन की सेवा के लिये आप अपना जीवन बचाओ ।

निकलंक ने अकलंक से कहा जब सैनिक उनके पीछे पड़े थे ।

5. मेरे पवित्र कुल को उज्ज्वल करने वाली कन्या , मैं मानता हूं कि मजाक में दिया गया व्रत भी सत्य है परंतु वह तो मात्र आठ दिनों के लिये ही था जबकि तू तो विवाह से ही इनकार कर रही हो।

प्रियदत्त सेठ ने अपनी पुत्री अनन्तमती से कहा जब उन्होंने विवाह के लिये मना कर दिया था ।

6. फेरे नहीं हुए उससे क्या ? मैं उनको हृदय से वरण कर चुकी हूँ , वे ही मेरे स्वामी और जीवन साथी है मेरे हृदय में किसी और के लिये स्थान नहीं है ।अब सांसारिक भोगों के बदले मोक्ष की साधना में मैं उनकी संगिनी बनूँगी और अपने नाथ के धर्म पथ पर चल कर अपना आत्म कल्याण करूँगी ।

राजुल ने अपने पिता से कहा जब नेमिकुमार ने दीक्षा ले ली ।

7. लोक निंदा के भय से आपने मुझे तो त्याग दिया परंतु लोक निंदा के भय से आप कभी जैनधर्म को मत त्यागना ।

सीता जी ने कृतांतवक्र सेनापति से कहा जब उन्हें जंगल मे छोड़ा गया ।

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